झारखंड में सत्ता वापसी की तैयारी में भाजपा, संगठन और कुड़मी राजनीति पर बढ़ा फोकस

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रांची। झारखंड में अगली विधानसभा चुनावी लड़ाई अभी दूर है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी की मौजूदा रणनीति केवल चुनावी गठबंधन पर निर्भर रहने के बजाय संगठन को मजबूत करने, अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने और क्षेत्रवार राजनीतिक मुद्दों पर सक्रियता बढ़ाने के इर्द-गिर्द दिखाई दे रही है। हालिया गतिविधियों से संकेत मिलता है कि केंद्रीय नेतृत्व झारखंड की राजनीति को लेकर प्रदेश संगठन के साथ लगातार समन्वय बनाए हुए है।

अमित शाह के साथ दिल्ली में हुई अहम बैठक

19 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ झारखंड भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की बैठक हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, बैठक में प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, चंपाई सोरेन और बाबूलाल मरांडी समेत पार्टी के प्रमुख नेता शामिल हुए थे। बैठक में झारखंड की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और संगठन से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई।

बैठक में खनन कानून से जुड़े मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहे। रिपोर्टों के मुताबिक, माइन्स एंड मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन (MMDR) संशोधन से जुड़े प्रावधानों को लेकर भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बीच राजनीतिक मतभेद हैं। भाजपा की ओर से कानून को लेकर अपने पक्ष को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर चर्चा किए जाने की बात सामने आई है। दूसरी ओर, झामुमो ने इस कानून के कुछ प्रावधानों को राज्य के अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाए हैं।

कुड़मी समाज पर बढ़ा राजनीतिक फोकस

झारखंड की राजनीति में कुड़मी समाज एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह है। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में आयोजित करम महोत्सव ने इस समुदाय से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है।

20 सितंबर को पुरुलिया में आयोजित कार्यक्रम में झारखंड के भी कई प्रमुख राजनीतिक चेहरे मौजूद रहे। रिपोर्टों के अनुसार, जमशेदपुर के भाजपा सांसद विद्युत वरण महतो और आजसू प्रमुख सुदेश महतो कार्यक्रम में शामिल हुए। झारखंड के अलग-अलग इलाकों से कुड़मी समाज के लोग भी महोत्सव में पहुंचे।

कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कुड़माली और राजबंशी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में पहल की बात कही। उन्होंने आंदोलन से जुड़े मामलों की समीक्षा और कुड़मी समाज से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी घोषणाएं कीं। इन बयानों के बाद झारखंड में भी कुड़मी समाज के बीच इस आयोजन को लेकर चर्चा तेज हुई।

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