नई दिल्ली। देश के कई हिस्सों में कम बारिश और लंबे समय तक सूखे जैसी परिस्थितियों के कारण खेती करना किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होने से बीजों के अंकुरण, पौधों की बढ़वार और फसल की पैदावार पर असर पड़ने का खतरा रहता है। ऐसी स्थिति में किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि उपलब्ध पानी में कौन सी फसल उगाई जाए, जिससे खेती की लागत नियंत्रित रहे और संभावित नुकसान को कम किया जा सके।
कम बारिश के दौरान फसल का चुनाव सोच-समझकर करना जरूरी है। धान जैसी अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों की खेती वहां जोखिम भरी हो सकती है, जहां सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे क्षेत्रों में किसान बाजरा, ज्वार, अरहर, मूंग, उड़द और तिल जैसी फसलों के विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, किसी भी फसल को हर क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। सही निर्णय लेने के लिए खेत की मिट्टी, उपलब्ध नमी, स्थानीय मौसम, बुवाई के समय, सिंचाई की सुविधा और बाजार में फसल की मांग को ध्यान में रखना जरूरी है।
1. बाजरा की खेती: कम बारिश वाले क्षेत्रों के लिए विकल्प
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बाजरा एक महत्वपूर्ण अनाज फसल है। यह गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता के लिए जाना जाता है। इसकी जड़ें मिट्टी में गहराई तक फैल सकती हैं, जिससे पौधे को उपलब्ध नमी का उपयोग करने में मदद मिलती है।
राजस्थान, हरियाणा और गुजरात सहित देश के कई राज्यों में बाजरे की खेती की जाती है। जिन किसानों के खेतों में सिंचाई की सुविधा सीमित है, वे अपने क्षेत्र के अनुकूल बाजरे की किस्मों पर विचार कर सकते हैं।
2. ज्वार की खेती से भी कम हो सकता है पानी पर दबाव
ज्वार देश की प्रमुख अनाज फसलों में शामिल है। इसका उपयोग भोजन और पशुओं के चारे के लिए किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में यह कम बारिश वाली परिस्थितियों में भी उगाई जाती है, इसलिए सीमित सिंचाई वाले किसान इसे संभावित विकल्प के रूप में देख सकते हैं।
ज्वार की खेती में मिट्टी की नमी, बुवाई का सही समय और बीज की गुणवत्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसान को यह भी तय करना चाहिए कि उसके खेत में अनाज वाली ज्वार की किस्म उपयुक्त होगी या चारे वाली।
3. अरहर की खेती: दलहन से मिल सकता है लाभ
कम पानी की उपलब्धता में अरहर की खेती पर भी विचार किया जा सकता है। अरहर एक प्रमुख दलहनी फसल है, जिसका उपयोग दाल के रूप में किया जाता है। इसकी जड़ें अपेक्षाकृत गहराई तक जा सकती हैं और उपयुक्त परिस्थितियों में पौधा मिट्टी में उपलब्ध नमी का उपयोग कर सकता है।
दलहनी फसलें मिट्टी में जैविक नाइट्रोजन बढ़ाने की प्रक्रिया में योगदान देती हैं। इससे फसल चक्र में इन्हें शामिल करना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, अरहर की बढ़वार और उत्पादन के लिए भी उचित नमी जरूरी होती है। अत्यधिक सूखी मिट्टी में बिना परिस्थितियों का आकलन किए बुवाई करना नुकसानदेह हो सकता है।
4. मूंग और उड़द: कम अवधि वाली फसलों पर दें ध्यान
मूंग और उड़द प्रमुख दलहनी फसलें हैं। इनकी कुछ किस्में अपेक्षाकृत कम अवधि में तैयार हो जाती हैं। सही मौसम और पर्याप्त शुरुआती नमी मिलने पर ये उन किसानों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती हैं, जो कम समय में फसल तैयार करना चाहते हैं।
इन फसलों का चयन करते समय केवल पानी की जरूरत को आधार नहीं बनाना चाहिए। बीज के अंकुरण, शुरुआती बढ़वार और फूल आने के समय नमी की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होती है। लंबे समय तक बारिश नहीं होने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
5. तिल की खेती: तिलहनी फसल का विकल्प
तिल एक प्रमुख तिलहनी फसल है, जिसे कुछ क्षेत्रों में सीमित पानी की परिस्थितियों में उगाया जाता है। इससे खाद्य तेल उत्पादन के लिए बीज प्राप्त होते हैं। कम बारिश वाले इलाकों में किसान तिल की खेती पर विचार कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए मिट्टी और मौसम का अनुकूल होना जरूरी है।
तिल की फसल को शुरुआती अवस्था में पर्याप्त नमी चाहिए। पानी की अत्यधिक कमी से अंकुरण प्रभावित हो सकता है, जबकि जलभराव भी फसल के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
कम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों में किसानों के लिए फसल का चुनाव महत्वपूर्ण हो जाता है। बाजरा और ज्वार जैसी अनाज फसलें, अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहन फसलें तथा तिल जैसी तिलहनी फसलें कुछ क्षेत्रों में उपयोगी विकल्प बन सकती हैं। मूंगफली की खेती भी स्थानीय मिट्टी और नमी की स्थिति अनुकूल होने पर की जा सकती है।
हालांकि, कोई भी फसल सूखे में नुकसान से पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती। इसलिए किसान अपने खेत की वास्तविक स्थिति, उपलब्ध पानी, बुवाई के समय और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर निर्णय लें। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेना और मिट्टी की नमी बचाने के उपाय अपनाना संभावित जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।





