नई दिल्ली। आमतौर पर लोगों के मन में यह धारणा रहती है कि फेफड़ों का कैंसर मुख्य रूप से उन लोगों को होता है, जिन्हें सिगरेट, बीड़ी या दूसरे तंबाकू उत्पादों के सेवन की आदत होती है। धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का एक प्रमुख जोखिम कारक जरूर है, लेकिन यह बीमारी केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं है। ऐसे लोग भी इस कैंसर की चपेट में आ सकते हैं, जिन्होंने कभी सिगरेट या बीड़ी को हाथ तक नहीं लगाया। इनमें महिलाएं भी शामिल हैं।
क्या है पल्मोनरी एडेनोकार्सिनोमा?
पल्मोनरी एडेनोकार्सिनोमा फेफड़ों के कैंसर का एक प्रकार है। यह सामान्यतः फेफड़ों की उन कोशिकाओं में विकसित होता है, जो श्लेष्मा (म्यूकस) जैसे पदार्थ बनाने वाले ऊतकों या अन्य ग्रंथीय विशेषताओं वाली कोशिकाओं से संबंधित होती हैं। यह नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) की श्रेणी में आता है, जो फेफड़ों के कैंसर का एक प्रमुख समूह है।
इस बीमारी में कुछ कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव होने लगते हैं। इसके कारण कोशिकाएं सामान्य नियंत्रण व्यवस्था से बाहर होकर असामान्य रूप से बढ़ सकती हैं। समय के साथ ये कोशिकाएं ट्यूमर बना सकती हैं और बीमारी आसपास के ऊतकों तक फैल सकती है। कुछ मामलों में कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंच सकता है।
एडेनोकार्सिनोमा फेफड़ों के बाहरी हिस्सों में विकसित हो सकता है। इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों में भी पाया जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर गैर-धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को इस बीमारी का खतरा अधिक होगा या हर मरीज में इसके पीछे एक ही कारण होगा।
धूम्रपान नहीं करने वालों को कैसे होता है लंग कैंसर?
फेफड़ों के कैंसर के पीछे कई संभावित जोखिम कारक हो सकते हैं। धूम्रपान उनमें सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है, लेकिन इसके अलावा भी कुछ परिस्थितियां जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।
1. वायु प्रदूषण: प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और अन्य हानिकारक पदार्थ फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। वायु प्रदूषण को फेफड़ों के कैंसर के जोखिम से जोड़ने वाले वैज्ञानिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति में कैंसर होने का कारण केवल प्रदूषण को मान लेना सही नहीं होगा।
2. घर के अंदर का प्रदूषण: कुछ घरों में लकड़ी, कोयले, उपले या दूसरे ठोस ईंधनों से खाना पकाया जाता है। यदि रसोई में पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं है, तो धुआं लंबे समय तक जमा रह सकता है। ऐसे धुएं के संपर्क में रहने से श्वसन संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। ठोस ईंधन से निकलने वाले प्रदूषकों और फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध पर भी शोध किया गया है।
3. पैसिव स्मोकिंग: यदि कोई व्यक्ति स्वयं धूम्रपान नहीं करता, लेकिन आसपास के लोगों के सिगरेट या बीड़ी के धुएं के संपर्क में रहता है, तो उसे भी नुकसान हो सकता है। इसे सेकंडहैंड स्मोक या पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है। घर, कार्यस्थल या अन्य बंद जगहों पर लगातार धुएं के संपर्क से बचना महत्वपूर्ण है।
4. आनुवंशिक बदलाव: फेफड़ों के कुछ कैंसरों में EGFR और ALK जैसे जीन से जुड़े बदलाव पाए जा सकते हैं। ये बदलाव कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने में भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे बदलाव धूम्रपान के इतिहास के बिना भी सामने आ सकते हैं। इनकी पहचान कुछ मरीजों के इलाज का विकल्प तय करने में मदद करती है।
5. रेडॉन और अन्य हानिकारक पदार्थ: रेडॉन एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी गैस है, जो कुछ इमारतों के अंदर जमा हो सकती है। लंबे समय तक इसका संपर्क फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है। इसके अलावा, एस्बेस्टस जैसे कुछ पदार्थों के संपर्क का भी कैंसर से संबंध पाया गया है।
6. उम्र और व्यक्तिगत जोखिम: उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का जोखिम बदल सकता है। परिवार में कैंसर का इतिहास और कुछ अन्य व्यक्तिगत या पर्यावरणीय कारक भी स्वास्थ्य मूल्यांकन में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। फिर भी, किसी एक जोखिम कारक की मौजूदगी से यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को कैंसर होगा ही।
महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर को लेकर चिंता क्यों?
महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सभी मरीजों की जीवनशैली और जोखिम कारक एक जैसे नहीं होते। कुछ महिलाएं कभी धूम्रपान नहीं करतीं, फिर भी उन्हें फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। ऐसे मामलों में पर्यावरणीय संपर्क, घर के अंदर का प्रदूषण और ट्यूमर में मौजूद आनुवंशिक बदलावों की जांच उपयोगी हो सकती है।
पल्मोनरी एडेनोकार्सिनोमा गैर-धूम्रपान करने वाले लोगों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण प्रकार है। लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर का हर मामला इसी प्रकार का होता है या इस बीमारी के सभी मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके लिए विश्वसनीय और समय के साथ तुलना किए जा सकने वाले आंकड़ों की जरूरत होती है।
फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
फेफड़ों का कैंसर शुरुआती अवस्था में कई बार स्पष्ट लक्षण नहीं देता। जब लक्षण सामने आते हैं, तो वे दूसरी बीमारियों से भी मिलते-जुलते हो सकते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर कैंसर का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
इसके कुछ संभावित लक्षण हैं:
- लगातार बनी रहने वाली या समय के साथ बदलती खांसी।
- खांसी के साथ खून आना।
- सांस लेने में परेशानी या सांस फूलना।
- सीने में लगातार दर्द या असहजता।
- आवाज में बदलाव या लगातार बैठना।
- बिना स्पष्ट कारण वजन कम होना।
- लगातार थकान और कमजोरी।
- बार-बार होने वाले कुछ श्वसन संक्रमण।
फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं है। पल्मोनरी एडेनोकार्सिनोमा ऐसा प्रकार है, जो धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों में भी हो सकता है। वायु प्रदूषण, पैसिव स्मोकिंग, कुछ हानिकारक पदार्थों का संपर्क और आनुवंशिक बदलाव इसके जोखिम को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
महिलाओं में इस बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाने का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि सही जानकारी उपलब्ध कराना होना चाहिए। लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी या खांसी में खून आने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करना, समय पर चिकित्सकीय जांच कराना और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उपचार लेना सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं।





