नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर नागपुर में विजयादशमी उत्सव और शस्त्र पूजन कार्यक्रम आयोजित किया। इस अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों और उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, स्वदेशी, सांस्कृतिक पहचान और युवाओं के सामने मौजूद चुनौतियों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की मजबूती का आधार समाज की एकजुटता है और इतिहास से यह सीख मिलती है कि जब-जब समाज में विभाजन बढ़ा, तब-तब देश को कमजोरी का सामना करना पड़ा।

‘हम जब भी बंटे, कमजोर हुए’, सामाजिक एकता का संदेश
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में सामाजिक एकता को देश की शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके संदेश का प्रमुख भाव यह था कि समाज में आपसी विश्वास, सहयोग और समरसता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता उसकी स्वाभाविक विशेषता है और अलग-अलग पंथों, क्षेत्रों, भाषाओं तथा परंपराओं के बीच रहते हुए भी देश के लोगों को राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सामाजिक एकता बनाए रखना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अलग-अलग समुदायों की मान्यताओं और जीवनशैली के बावजूद लोगों के बीच संवाद तथा परस्पर सम्मान सामाजिक स्थिरता के लिए जरूरी हैं। भागवत के संबोधन में भी यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि देश और समाज को मजबूत बनाने के लिए लोगों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्रीय हित के विषय में सोचना चाहिए।
उन्होंने भारत माता के सर्वोच्च स्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अनेक पंथ, प्रांत और सामाजिक परंपराएं मौजूद हैं। इन विविधताओं के बीच राष्ट्रीय पहचान और देश के प्रति साझा भाव बनाए रखना आवश्यक है। उनके अनुसार, विविधता को स्वाभाविक रूप में स्वीकार करते हुए समाज में समरसता बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।
स्वदेशी अपनाने और भारतीय पहचान मजबूत करने पर जोर
RSS प्रमुख ने स्वदेशी के महत्व पर भी बात की। उनके संबोधन में भारतीय समाज को अपनी आवश्यकताओं, संसाधनों और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूक बनाने का संदेश दिखाई दिया। स्वदेशी का विचार स्थानीय उत्पादों, भारतीय उद्यमों और देश में विकसित क्षमताओं को प्रोत्साहित करने से जुड़ा है।
स्वदेशी को बढ़ावा देने का उद्देश्य केवल वस्तुओं की खरीद तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसमें स्थानीय उत्पादन, रोजगार, कौशल और आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी महत्व दिया जाता है। जब उपभोक्ता स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं और उद्यमियों को अपने काम के विस्तार के अवसर मिलते हैं, तो इसका लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
भागवत ने संघ के 100 वर्षों के कार्य का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन भारत को उसकी अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर संगठित तथा मजबूत बनाने का काम करता रहा है। इस संदर्भ में उनका संदेश भारतीय मूल्यों के प्रति जागरूकता और समाज की सामूहिक भागीदारी से जुड़ा रहा।
संत रविदास और राजा नारायण बसु का उल्लेख
विजयादशमी कार्यक्रम में मोहन भागवत ने ऐतिहासिक और सामाजिक योगदान देने वाली विभूतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बंगाल के राजा नारायण बसु का उल्लेख करते हुए उनके जन्म के 200 वर्ष पूरे होने की बात कही। इस संदर्भ में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के योगदान को याद करने और उनसे जुड़े विचारों पर चर्चा करने का महत्व सामने आया।
भागवत ने संत रविदास के योगदान को भी याद किया। संत रविदास भारतीय भक्ति परंपरा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। उनके विचारों में समानता, मानवीय गरिमा, भक्ति और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठने का संदेश महत्वपूर्ण रहा है।
संत रविदास की शिक्षाएं सामाजिक समरसता के विषय में आज भी प्रासंगिक मानी जाती हैं। भारतीय समाज में विभिन्न वर्गों के बीच सम्मान और समानता की भावना को मजबूत करने के लिए उनके विचारों का उल्लेख किया जाता रहा है। भागवत के संबोधन में उनका जिक्र सामाजिक एकता और समरसता के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण रहा।
इस वर्ष के संबोधन में स्वदेशी, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता, नशे की समस्या, युवाओं के विकास और डिजिटल माध्यमों से जुड़े विषयों को स्थान मिला। साथ ही संत रविदास और राजा नारायण बसु जैसी विभूतियों के उल्लेख के जरिए इतिहास तथा सांस्कृतिक विरासत की चर्चा भी की गई।
कुल मिलाकर, नागपुर में आयोजित विजयादशमी समारोह में मोहन भागवत का संदेश समाज को एकजुट रखने, भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूक रहने तथा नई पीढ़ी को जिम्मेदार बनाने पर केंद्रित रहा। उन्होंने सामाजिक विभाजन से बचने, विविधता का सम्मान करने और देश के विकास में प्रत्येक नागरिक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।




