MP High Court on NSA: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने NSA के तहत दो भाइयों की हिरासत रद्द की, कहा- असाधारण कानून का लापरवाही से हो रहा इस्तेमाल

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भोपाल। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निवारक हिरासत में रखे गए दो सगे भाइयों को बड़ी राहत देते हुए उनकी हिरासत का आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने जबलपुर के राजेंद्र ठाकुर उर्फ छोटू और राजेश ठाकुर उर्फ भैया की नजरबंदी को कानून के अनुरूप नहीं माना। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि अधिकारियों ने हिरासत का आदेश पारित करते समय उपलब्ध तथ्यों की स्वतंत्र रूप से पर्याप्त जांच नहीं की। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि संविधान निर्माताओं ने निवारक हिरासत को एक असाधारण उपाय के रूप में स्वीकार किया था, लेकिन वर्षों से इसके लापरवाहीपूर्वक इस्तेमाल की प्रवृत्ति चिंताजनक है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला जबलपुर के दो भाइयों राजेंद्र ठाकुर और राजेश ठाकुर से संबंधित है। जबलपुर के जिला मजिस्ट्रेट ने 6 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 की धारा 3(2) के तहत दोनों के खिलाफ तीन महीने की निवारक हिरासत का आदेश जारी किया था। बाद में हिरासत की अवधि 1 अप्रैल और 6 जुलाई 2026 को अगले तीन-तीन महीनों के लिए बढ़ाई गई थी।

प्रशासन की ओर से दलील दी गई थी कि दोनों भाइयों की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं। पुलिस रिपोर्ट में उनके खिलाफ कई आपराधिक मामलों का उल्लेख किया गया था। अधिकारियों ने दावा किया था कि उनकी गतिविधियां बार-बार सामने आई हैं और सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए निवारक कार्रवाई आवश्यक थी।

रिपोर्ट में 4 जनवरी 2026 की एक कथित घटना का भी उल्लेख था। आरोप था कि एक भाई ने शिकायतकर्ता के घर पर देसी बम फेंका था, जिससे विस्फोट हुआ और क्षेत्र के लोगों में भय का माहौल बना। प्रशासन ने इन परिस्थितियों को हिरासत के समर्थन में प्रस्तुत किया था।

22 आपराधिक मामलों के रिकॉर्ड पर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि अधिकारियों ने हिरासत के समर्थन में कुल 22 मामलों का उल्लेख किया था। उनके वकील ने अदालत को बताया कि इनमें से कई मामलों में दोनों भाइयों को राहत मिल चुकी थी और कुछ मामलों में मामूली दंड लगाया गया था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश जानकारी के अनुसार, 16 मामलों में सक्षम अदालतों या जांच एजेंसियों से बरी होने का दावा किया गया था। कुछ अन्य मामलों में मामूली जुर्माने का उल्लेख किया गया, जबकि एक मामले में जांच लंबित बताई गई। अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड में इन तथ्यों को लेकर महत्वपूर्ण विसंगतियां सामने आईं।

हाई कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि हिरासत के आदेश में कई ऐसे मामलों को लंबित बताया गया था, जिनमें संबंधित व्यक्ति पहले ही बरी हो चुका था। अदालत के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर इतना गंभीर प्रतिबंध लगाया जा रहा हो, तब उसके खिलाफ उपलब्ध रिकॉर्ड की सही स्थिति का सत्यापन करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों द्वारा तथ्यों की गलत जानकारी के आधार पर निर्णय लेने से पूरी हिरासत प्रक्रिया प्रभावित होती है। यदि मूल तथ्य ही सही नहीं हैं, तो उन तथ्यों के आधार पर कानून के उचित इस्तेमाल की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

NSA क्या है और इसका इस्तेमाल कब किया जा सकता है?

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 एक ऐसा कानून है, जिसके तहत निर्धारित परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखा जा सकता है। इसका उद्देश्य कुछ मामलों में संभावित गतिविधियों को रोकना है, जिनसे देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या कानून में निर्दिष्ट अन्य महत्वपूर्ण हितों को खतरा होने की आशंका हो।

निवारक हिरासत सामान्य आपराधिक मुकदमे में सजा दिए जाने से अलग होती है। आपराधिक प्रक्रिया में किसी कथित अपराध की जांच, अभियोजन और अदालत में सुनवाई के बाद दोषसिद्धि या बरी किए जाने का सवाल आता है। इसके विपरीत, निवारक हिरासत का आधार भविष्य में संभावित गतिविधियों को रोकने की आवश्यकता होती है। इसलिए इसका इस्तेमाल कानून में निर्धारित शर्तों और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

इस कानून के तहत प्रशासनिक अधिकारियों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ये अधिकार असीमित नहीं हैं। हिरासत के आदेश के लिए प्रासंगिक सामग्री, तथ्यों का उचित मूल्यांकन और कानून के अनुसार संतुष्टि आवश्यक है। केवल पुराने मामलों की संख्या या किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप अपने आप में निवारक हिरासत को उचित नहीं बना देते।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य मामले का उल्लेख किया। इस फैसले में निवारक हिरासत की वैधता जांचने के लिए आवश्यक सिद्धांतों पर चर्चा की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों के अनुसार, हिरासत का आदेश पारित करने वाले अधिकारी को प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना चाहिए। उपलब्ध सामग्री का तार्किक महत्व होना चाहिए, पुराने आचरण और वर्तमान में हिरासत की आवश्यकता के बीच संबंध होना चाहिए तथा आदेश में पर्याप्त स्पष्टता होनी चाहिए, ताकि संबंधित व्यक्ति उसके आधार को समझकर उचित प्रतिनिधित्व कर सके।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अधिकारियों की ओर से स्वतंत्र रूप से विचार करने की प्रक्रिया में कमी दिखाई दी। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत निहित अधिकारों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया। ये प्रावधान समानता, स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा से संबंधित हैं।

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल करते समय प्रशासनिक अधिकारियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन इस उद्देश्य के लिए की जाने वाली कार्रवाई भी कानून और संविधान के अनुरूप होनी चाहिए।

हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने वाला आदेश केवल औपचारिक प्रक्रिया पूरी करके जारी नहीं किया जा सकता। उपलब्ध रिकॉर्ड की सत्यता, प्रासंगिक तथ्यों का मूल्यांकन और स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल अनिवार्य है।

जबलपुर के दोनों भाइयों से जुड़े मामले में अदालत का हस्तक्षेप इसी संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि निवारक हिरासत एक असाधारण उपाय है और इसका प्रयोग कानून में निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।

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