पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान की ओर से आई एक नई चेतावनी ने हिंद महासागर और एशिया की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ईरान के सर्वोच्च नेता के सलाहकार मेजर जनरल याह्या रहीम सफावी ने कहा है कि अगर अमेरिका या इजराइल की ओर से ईरान पर दोबारा हमला किया जाता है तो संघर्ष का दायरा हिंद महासागर तक फैल सकता है। ईरानी समाचार एजेंसी फर्स के जरिए जारी एक वीडियो में सफावी ने कहा कि संघर्ष पहले ही फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट से आगे बढ़कर लाल सागर तक पहुंच चुका है और आगे इसका विस्तार संभव है।
ईरान ने क्या कहा?
याह्या रहीम सफावी ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका नया हमला शुरू करता है तो लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के आसपास एक नया मोर्चा खुल सकता है। उनके अनुसार, मौजूदा संघर्ष का भौगोलिक दायरा फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट से लाल सागर तक पहुंच चुका है और भविष्य में यह हिंद महासागर या उससे आगे भी फैल सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया के कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पहले से ही सुरक्षा चिंताओं के कारण प्रभावित हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह ईरानी अधिकारी की चेतावनी है, न कि हिंद महासागर में युद्ध फैलने की पुष्टि। इसके वास्तविक असर का दायरा आगे की सैन्य और कूटनीतिक घटनाओं पर निर्भर करेगा।
होर्मुज स्ट्रेट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल समुद्री मार्गों में से एक है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी यानी IEA के अनुसार, 2025 में लगभग 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल इस जलमार्ग से होकर गुजरा। IEA के मुताबिक, इस मार्ग से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा एशियाई देशों की ओर जाता है और चीन, भारत तथा जापान इसके प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं।
IEA के अनुसार, 2025 में होर्मुज से गुजरने वाले कच्चे तेल के निर्यात में चीन और भारत की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 44 प्रतिशत थी। यही वजह है कि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक किसी तरह की बाधा पैदा होने पर एशियाई ऊर्जा बाजारों पर असर पड़ सकता है। होर्मुज से केवल तेल ही नहीं, बल्कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG की भी बड़ी मात्रा गुजरती है।
तेल महंगा हुआ तो आम लोगों पर क्या असर?
यदि लंबे समय तक तेल आपूर्ति बाधित होती है और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो इसका असर आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से रिफाइनिंग, परिवहन और पेट्रोलियम उत्पादों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा समुद्री जहाजों के लिए बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से दूसरे आयातित सामानों की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि किसी भी संभावित असर की वास्तविक तीव्रता इस बात पर निर्भर करेगी कि तनाव कितना बढ़ता है, समुद्री मार्ग कितने समय तक प्रभावित रहते हैं और वैश्विक बाजार में अतिरिक्त तेल की आपूर्ति कितनी उपलब्ध रहती है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान की चेतावनी को क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि हिंद महासागर तक संघर्ष फैलने की स्थिति अभी एक संभावित परिदृश्य है। होर्मुज और लाल सागर जैसे समुद्री मार्गों में पहले से जारी व्यवधान ने यह जरूर दिखा दिया है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहता।




