हाईकोर्ट के निर्देश पर पेश हुई जांच रिपोर्ट
भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान आर्थिक अपराध शाखा की ओर से जांच की प्रगति से जुड़ी जानकारी रखी गई। अदालत ने पहले EOW को राज्य में सामने आए धान खरीद और परिवहन से संबंधित मामलों में की गई कार्रवाई की स्थिति बताने का निर्देश दिया था। इसी क्रम में एजेंसी ने 90 एफआईआर से जुड़ी जांच की स्टेटस रिपोर्ट पेश की।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, यह मामला केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। इससे पहले जबलपुर जिले में धान के परिवहन और आपूर्ति से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की जांच सामने आई थी। इसके बाद अदालत ने राज्य के अन्य जिलों में भी इसी प्रकार की अनियमितताओं की जांच पर जोर दिया था।
जबलपुर से सामने आया था मामला
पूरे मामले की पृष्ठभूमि में जबलपुर जिले में सामने आई धान परिवहन संबंधी कथित अनियमितताएं महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी के अनुसार, जबलपुर कलेक्टर की जांच में धान की मात्रा और परिवहन के लिए दर्ज वाहनों के बीच गंभीर असंगतियां सामने आई थीं। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया था कि जांच में सरकारी एजेंसियों के कर्मचारियों, राइस मिलर्स और परिवहन से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है।
अदालत के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि जबलपुर में प्रारंभिक जांच के दौरान धान के परिवहन से संबंधित वाहनों और वास्तविक आपूर्ति के बीच अंतर पाया गया था। इसी आधार पर अदालत ने राज्य के अन्य हिस्सों में भी जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।
कुछ रिपोर्टों में ऐसे मामलों का भी उल्लेख हुआ है, जहां बड़ी मात्रा में धान के परिवहन के लिए ऐसे वाहनों के नंबर दर्ज होने की बात सामने आई जिनकी क्षमता उस मात्रा के परिवहन के लिहाज से संदिग्ध थी। हालांकि अलग-अलग मामलों में वास्तविक जिम्मेदारी और दोष तय होना जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।
फिलहाल अदालत के समक्ष प्रस्तुत जानकारी से इतना स्पष्ट है कि धान खरीद और परिवहन में कथित अनियमितताओं की जांच अब व्यापक स्तर पर चल रही है। 90 एफआईआर का आंकड़ा इस जांच के विस्तार को दर्शाता है, लेकिन इन मामलों में अंतिम जिम्मेदारी और दोष का निर्धारण संबंधित जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगा।
धान की सरकारी खरीद किसानों, सरकारी एजेंसियों, परिवहनकर्ताओं और राइस मिलों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। ऐसे में रिकॉर्ड और वास्तविक आपूर्ति के बीच किसी भी कथित अंतर की जांच का सीधा संबंध सरकारी खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता और सार्वजनिक संसाधनों की निगरानी से जुड़ता है। हाईकोर्ट की अगली सुनवाई में सरकार और संबंधित कॉरपोरेशन के विस्तृत जवाब के बाद इस पूरे मामले की आगे की दिशा अधिक स्पष्ट होने की संभावना है।




