धान की कटाई के बाद पराली जलाना पड़ सकता है महंगा, खेत में आग लगाने पर लग सकता है जुर्माना; जानें किसानों के लिए सुरक्षित विकल्प

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नई दिल्ली। धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली का निपटान किसानों के सामने हर साल बड़ी चुनौती बन जाता है। अगली फसल की बुवाई के लिए खेत जल्दी खाली करने के उद्देश्य से कुछ किसान पराली में आग लगा देते हैं। लेकिन यह तरीका अब किसानों के लिए आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। पराली जलाने की घटनाओं पर पुलिस, प्रशासन और कृषि विभाग के साथ-साथ पर्यावरण से जुड़ी एजेंसियां भी निगरानी रखती हैं। खेत में पराली जलती पाए जाने पर संबंधित किसान के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है और निर्धारित नियमों के तहत पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति यानी जुर्माना लगाया जा सकता है।

इसलिए धान की कटाई के बाद पराली का प्रबंधन करना किसानों के लिए जरूरी है। पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाने, मशीनों की मदद से उसका प्रबंधन करने या दूसरे उपयोग में लाने जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के साथ खेत की मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।

पराली जलाने पर कितना जुर्माना लग सकता है?

पराली जलाने पर जुर्माने की राशि जमीन के रकबे के आधार पर तय होती है। दिल्ली-NCR और उससे जुड़े क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के अधिकार क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार ने 6 नवंबर 2024 को पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की दरों में संशोधन किया था। संशोधित नियमों के अनुसार पहले के मुकाबले जुर्माने की राशि दोगुनी कर दी गई।

प्रशासन कैसे रखता है पराली जलाने पर नजर?

धान की कटाई के मौसम में पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी के लिए प्रशासन और संबंधित विभाग सक्रिय रहते हैं। खेतों में आग लगने की सूचना मिलने पर संबंधित अधिकारियों की ओर से घटना का सत्यापन किया जा सकता है। इसके बाद जमीन के रिकॉर्ड और रकबे की जानकारी के आधार पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की कार्रवाई की जाती है।

CAQM के संशोधित नियमों के तहत अधिकृत नोडल और पर्यवेक्षण अधिकारियों को पराली जलाने के मामलों में पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने और वसूलने का अधिकार दिया गया है। इसके लिए संबंधित राज्य सरकारों को आवश्यक व्यवस्था लागू करनी होती है। Press Information Bureau+1

किसान के खिलाफ कार्रवाई के लिए केवल सामान्य चेतावनी पर्याप्त नहीं होती। नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार चालान जारी किया जाता है। चालान में किसान का नाम, पता, गांव, जिला, जमीन का विवरण और संबंधित खेत का रकबा जैसी जानकारियां दर्ज की जाती हैं। संशोधित नियमों के निर्धारित प्रारूप में चालान की राशि जमा करने के लिए 30 दिन की अवधि का उल्लेख है।

पराली जलाने से पर्यावरण और स्वास्थ्य को नुकसान

पराली में आग लगाने से खेतों के आसपास धुआं फैलता है। इसमें मौजूद धूल और सूक्ष्म कण हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। जब एक ही क्षेत्र में बड़ी संख्या में खेतों में आग लगाई जाती है, तो प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। हवा की दिशा और मौसम की स्थिति के अनुसार धुआं आसपास के गांवों, कस्बों और शहरों तक पहुंच सकता है।

इसका असर बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी समस्याओं से परेशान लोगों पर अधिक पड़ सकता है। धुएं के कारण आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा सड़क के आसपास धुआं फैलने से दृश्यता कम हो सकती है, जिससे यातायात में भी परेशानी पैदा हो सकती है।

पराली जलाने का नुकसान केवल हवा तक सीमित नहीं रहता। खेत की सतह पर आग लगने से मिट्टी में मौजूद उपयोगी जैविक पदार्थ और सूक्ष्मजीव भी प्रभावित हो सकते हैं। इससे मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका रहती है। लगातार पराली जलाने के बजाय उसका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना खेती के लिए अधिक उपयोगी विकल्प माना जाता है।

पराली जलाने के बजाय किसान क्या कर सकते हैं?

किसानों के पास पराली के प्रबंधन के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं। कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभागों की ओर से ऐसी मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाता है, जिनसे फसल अवशेषों को जलाए बिना अगली फसल की बुवाई की जा सके।

1. हैप्पी सीडर और सुपर सीडर का इस्तेमाल: हैप्पी सीडर और सुपर सीडर जैसी मशीनें खेत में मौजूद फसल अवशेषों के बीच गेहूं की बुवाई करने में मदद करती हैं। इससे पराली को जलाने की जरूरत कम हो सकती है और खेत की तैयारी का काम भी आसान बनाया जा सकता है।

2. मल्चर और श्रब मास्टर: मल्चर तथा श्रब मास्टर जैसी मशीनों से पराली को काटकर छोटे टुकड़ों में फैलाया जा सकता है। इससे फसल अवशेषों का खेत में ही प्रबंधन करने में मदद मिलती है।

3. पराली को मिट्टी में मिलाना: खेत की जरूरत और मिट्टी की स्थिति के अनुसार उचित कृषि यंत्रों की सहायता से फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाया जा सकता है। इससे समय के साथ जैविक पदार्थ मिट्टी का हिस्सा बन सकते हैं।

4. गांठ बनाकर दूसरे उपयोग में लाना: बेलर मशीनों की मदद से पराली को इकट्ठा कर उसकी गांठें बनाई जा सकती हैं। इन गांठों को उपलब्ध व्यवस्था के अनुसार बायोमास आधारित ऊर्जा उत्पादन और अन्य उपयोगों के लिए भेजा जा सकता है।

5. जैव अपघटक का उपयोग: कृषि विभाग की सलाह के अनुसार जैव अपघटक यानी बायो-डिकंपोजर का इस्तेमाल भी फसल अवशेषों के प्रबंधन के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। इसका उपयोग स्थानीय परिस्थितियों और निर्धारित कृषि विधि के अनुसार करना चाहिए। Indian Council of Agricultural Research

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