नई दिल्ली। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके निमित्त तर्पण एवं श्राद्ध कर्म करने की परंपरा रही है। इस अवधि में परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करते हुए धार्मिक विधि-विधान के अनुसार कर्मकांड करते हैं। पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है, जिसे श्राद्ध और तर्पण की दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है।
सर्वपितृ अमावस्या का क्या महत्व है?
पितृपक्ष में अलग-अलग तिथियों पर पूर्वजों के लिए श्राद्ध किया जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका किसी विशेष तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाता, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन परिवार अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध कर्म कर सकते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या को पितृपक्ष का अंतिम दिन माना जाता है। इसी कारण यह दिन उन परिवारों के लिए विशेष महत्व रखता है जो पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक कर्म करना चाहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण, दान और जरूरतमंदों को भोजन कराने जैसी गतिविधियां श्रद्धा के साथ की जाती हैं।
श्राद्ध के भोजन में कौवे को क्यों जोड़ा गया?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में कौवे का संबंध पितरों से जोड़ा गया है। श्राद्ध के दौरान तैयार भोजन का एक हिस्सा कौवे के लिए निकालने की परंपरा इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। परिवार के लोग भोजन को निर्धारित स्थान पर रखते हैं और कौवे के आने की प्रतीक्षा करते हैं।
कई लोगों की आस्था है कि कौवे द्वारा भोजन ग्रहण करना पितरों के प्रति श्रद्धा की स्वीकृति का प्रतीक है। लेकिन इस विश्वास को धार्मिक आस्था के संदर्भ में ही समझना चाहिए। कौवे का व्यवहार प्राकृतिक परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है। आसपास भोजन की उपलब्धता, लोगों की आवाजाही, मौसम, स्थान और कौवे की मौजूदगी जैसी सामान्य वजहों से वह किसी स्थान पर भोजन करने के लिए नहीं आ सकता है।
इसलिए यदि श्राद्ध का भोजन रखने के बाद कौवा तत्काल वहां नहीं पहुंचता, तो इसे लेकर भय या चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।





