drnewsindia.com / सीहोर | डिजिटल डेस्क: सावन के महीने में ग्रामीण खेल और संस्कृति की एक अनोखी और जीवंत तस्वीर देखने को मिली। चरनाल के मुख्य बाजार में रविवार को पारंपरिक 43वीं गेड़ी प्रतियोगिता का शानदार आयोजन किया गया।
ढोल की गूंज, गेड़ी पर सवार खिलाड़ियों का संतुलन और दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे चरनाल शहर को रोमांच से भर दिया। प्रतियोगिता को देखने के लिए सीहोर के अलावा पास के राजगढ़ और भोपाल जिले से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
📊 आंकड़े और मुकाबले: 78 जोड़ियों ने दिखाया दमखम
यह प्रतियोगिता अपनी खास और पारंपरिक खेल शैलियों के लिए पहचानी जाती है। इस बार दो मुख्य पद्धतियों में रोमांचक मुकाबले खेले गए:
- ठोकर पद्धति (Thokar Style): कुल 52 जोड़ियों ने हिस्सा लिया। (पहला मुकाबला: चरनाल के यश सोनी बनाम खखंदरपुरा के आदेश केवट)
- धक्का पद्धति (Dhakka Style): कुल 26 जोड़ियों ने अपनी ताकत दिखाई। (पहला मुकाबला: जितेंद्र बनाम सोनू मांगीलाल)
सुबह से शुरू हुई प्रतियोगिता का दौर देर शाम तक चला। जैसे-जैसे मैच फाइनल राउंड की तरफ बढ़े, दर्शकों का रोमांच भी चरम पर पहुंच गया।
🌟 आयोजन की खास बातें (Key Highlights)
- पारंपरिक खेल संस्कृति: आयोजकों का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के इस पारंपरिक खेल को जीवित रखना और नई पीढ़ी को इससे जोड़ना है।
- दूर-दूर से पहुंचे खिलाड़ी: इस प्रतियोगिता का इंतजार अंचल के लोगों को पूरे साल रहता है, यही वजह है कि हर साल पड़ोसी जिलों से भी प्रतिभागी यहां खिंचे चले आते हैं।
- रोमांचक माहौल: ढोल की थाप पर गेड़ी पर संतुलन बनाते खिलाड़ियों को देखना दर्शकों के लिए बेहद रोमांचक अनुभव रहा।
👥 जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिकों की मौजूदगी
कार्यक्रम के दौरान क्षेत्र के अनेक जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गणमान्य नागरिकों ने शिरकत की:
- विशेष उपस्थिति: सांसद प्रतिनिधि मायाराम गौर, भाजपा जिला मंत्री व पूर्व मंडल अध्यक्ष गिरीष सोलंकी, शिवपाल सिंह सोलंकी, ओमकार सिंह सोलंकी, पूर्व चेयरमैन कैलाशचंद्र गौर।
- शिक्षा व समाज से जुड़े चेहरे: गायत्री विद्या मंदिर स्कूल के डायरेक्टर राजेंद्र गौर, सरदार पटेल एच.एस. स्कूल के संचालक कमलेश गौर आदि।
- सफल संचालन: प्रतियोगिता का मंच और खेल संचालन डॉ. रमेश श्रीवास्तव ‘डिम्मी’ और शिक्षक रमण प्रकाश तिवारी द्वारा किया गया।
संपादकीय नोट: चरनाल की 43वीं गेड़ी प्रतियोगिता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिक दौर में भी हमारी ग्रामीण खेल परंपराएं और सावन के पारंपरिक त्योहार उतने ही जीवंत और लोकप्रिय हैं।




