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नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। 600 से अधिक मौतों की पुष्टि हो चुकी है और 2,500 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। इनमें भारतीय, अमेरिकी, चीनी और ब्रिटिश नागरिकों समेत सैकड़ों विदेशी शामिल हैं। इस संकट के बीच भारत, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी ‘सर्च एंड रेस्क्यू’ टीमों और सेना को भेजने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन नेपाल ने विदेशी सैन्य सहायता लेने से स्पष्ट इंकार कर दिया है।
1. नेपाल का वर्तमान रुख: केवल सीमित तकनीकी मदद
- विदेशी सेनाओं/रेस्क्यू टीमों पर रोक: नेपाल सरकार और रक्षा बलों का मानना है कि विदेशी सेना की मौजूदगी से जमीनी समन्वय और लॉजिस्टिक्स में जटिलता पैदा होगी।
- सीमित विशेषज्ञता को अनुमति: नेपाल ने केवल बेहद विशिष्ट और तकनीकी कार्यों (जैसे टनल रेस्क्यू, फॉरेंसिक जांच, DNA टेस्टिंग और पोर्टेबल बेली ब्रिज लगाने) के लिए भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के तकनीकी विशेषज्ञों को मंजूरी दी है।
- स्थानीय भूगोल की प्राथमिकता: नेपाली सुरक्षा बलों का कहना है कि वे स्थानीय इलाके और दुर्गम पहाड़ियों की भौगोलिक स्थिति से बेहतर परिचित हैं।

2. 2015 का ‘गोरखा भूकंप’ और पुराना अनुभव
नेपाल की इस हिचकिचाहट के पीछे 2015 में आए 7.8 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के दौरान मिले कड़वे अनुभव हैं:
- लॉजिस्टिक्स और एयरपोर्ट पर भारी अव्यवस्था: काठमांडू का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (त्रिभुवन एयरपोर्ट) विदेशी विमानों और रेस्क्यू टीमों की भारी भीड़ के कारण जाम हो गया था। गैर-जरूरी राहत सामग्री और अव्यवस्थित टीमों से राहत कार्य में बाधा उत्पन्न हुई थी।
- भू-राजनीतिक तनाव: भारतीय और चीनी वायुसेना के हेलीकॉप्टरों व रेस्क्यू टीमों की समानांतर आवाजाही से दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा जैसी स्थिति बन गई थी, जिससे नेपाल ने सुरक्षा और संप्रभुता संबंधी चिंताएं महसूस की थीं।
- मीडिया रिपोर्टिंग पर रोष: उस समय भारतीय मीडिया के कुछ कवरेज को लेकर नेपाल में जनता का असंतोष देखा गया था, जिसके चलते सोशल मीडिया पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे।
3. क्या नेपाल अकेले लापता लोगों को तलाश पाएगा?
नेपाल भले ही अपनी क्षमताओं पर भरोसा जता रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत में उसके सामने कई बड़ी बुनियादी चुनौतियां हैं:
- इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान: 40 से अधिक पुलों और मुख्य सड़कों के बह जाने से भारी मशीनरी और राहत उपकरण प्रभावित इलाकों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।
- सीमित हवाई संसाधन: नेपाल सेना के पास केवल 15 हेलीकॉप्टर हैं, जो इस स्तर की आपदा में बड़े पैमाने पर एयर-रेस्क्यू संचालन के लिए नाकाफी हैं।
- जटिल टनल रेस्क्यू: त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट जैसी जगहों पर सुरंगों के निकास द्वार पूरी तरह बंद हैं, जहां 500 से अधिक लोग फंसे हो सकते हैं। इनके लिए उन्नत थर्मल सेंसिंग उपकरण और टनल विशेषज्ञों की अत्यधिक आवश्यकता है।

4. संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून (UN Charter)
संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत किसी भी संप्रभु देश की अनुमति के बिना वहां विदेशी सेना का प्रवेश कानूनन प्रतिबंधित है। हालांकि कुछ देश आपातस्थिति में अपने नागरिकों की सुरक्षा का तर्क देते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियमानुसार मेजबान देश की सहमति के बिना कोई भी बाहरी टीम राहत अभियान नहीं चला सकती।
निष्कर्ष:
नेपाल अपनी संप्रभुता बनाए रखने और 2015 जैसी अव्यवस्था से बचने के लिए सतर्कता बरत रहा है। हालांकि, तबाही के पैमाने और लापता लोगों की बड़ी संख्या को देखते हुए नेपाल को टनल एक्सपर्ट्स, बेली ब्रिज और उन्नत तकनीकों के लिए मित्र देशों के साथ नियंत्रित समन्वय बनाए रखना होगा।




