पेट्रोल में एथेनॉल क्यों मिला रही है सरकार? जानिए फायदे, नुकसान और पूरी कहानी

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drnewsindia.com/नई दिल्ली

देशभर में इन दिनों पेट्रोल में मिलाए जा रहे एथेनॉल को लेकर चर्चा तेज है। सोशल मीडिया पर गुलाबी पेट्रोल, पेट्रोल टैंक में चींटियां लगने और ईंधन में पानी जैसी चीजें दिखाने वाले कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। हालांकि इन दावों की सत्यता की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की सरकारी नीति पर बहस लगातार बढ़ रही है।

सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण कम होगा। वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञों और वाहन मालिकों का एक वर्ग इंजन, माइलेज, पानी की खपत और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठा रहा है।

क्या है एथेनॉल ब्लेंडिंग?

एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है, जिसे मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों से तैयार किया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।

भारत ने वर्ष 2001 में 5 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के पायलट प्रोजेक्ट से शुरुआत की थी। इसके बाद 2003 में एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम लागू किया गया। वर्ष 2014 के बाद इस योजना को तेजी से आगे बढ़ाया गया और पहले 10 प्रतिशत तथा बाद में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य तय किया गया। अब देशभर में E20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जा चुका है। सरकार भविष्य में E85 और 100 प्रतिशत एथेनॉल पर चलने वाले वाहनों को भी बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।

सरकार के मुताबिक एथेनॉल के बड़े फायदे

1. विदेशी मुद्रा की बचत

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। सरकार के अनुसार एथेनॉल मिश्रण से तेल आयात में कमी आई है, जिससे पिछले वर्षों में करीब 1.84 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई।

2. किसानों की आय में वृद्धि

एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना, मक्का और चावल की मांग बढ़ी है। सरकार का दावा है कि इससे किसानों को पिछले 12 वर्षों में लगभग 1.58 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय मिली है।

3. प्रदूषण में कमी

नीति आयोग और अन्य अध्ययनों के अनुसार एथेनॉल मिश्रित ईंधन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पेट्रोल की तुलना में 60 से 65 प्रतिशत तक कम हो सकता है। सरकार का कहना है कि इससे कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आई है।

एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर क्या हैं प्रमुख चिंताएं?

1. माइलेज और इंजन पर असर

कई वाहन मालिकों और मैकेनिकों का कहना है कि पुराने वाहनों में माइलेज कम हो रहा है तथा फ्यूल पंप, सेंसर और फिल्टर जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने मॉडल की कई गाड़ियां केवल E10 ईंधन के लिए डिजाइन की गई थीं।

2. कीमत में राहत नहीं

एथेनॉल की कीमत पेट्रोल से कम होने के बावजूद उपभोक्ताओं को पेट्रोल की कीमतों में कोई विशेष राहत नहीं मिली है। इस वजह से आम लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि सस्ता मिश्रण होने के बावजूद ईंधन महंगा क्यों बना हुआ है।

3. पानी की भारी खपत

विशेषज्ञों के अनुसार एक लीटर एथेनॉल तैयार करने में फसल के आधार पर हजारों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। जल संकट झेल रहे भारत जैसे देश में इसे लेकर चिंता जताई जा रही है।

4. खाद्य फसलों पर दबाव

यदि गन्ना, मक्का और चावल का बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में जाएगा तो भविष्य में खाद्यान्न, दालों और तिलहनों की खेती प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।

5. हितों के टकराव पर सवाल

एथेनॉल नीति को लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी पर विपक्ष ने हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं। आरोप है कि उनके परिवार से जुड़ी कंपनियां भी एथेनॉल उत्पादन के क्षेत्र में हैं। हालांकि गडकरी इन आरोपों को खारिज करते हुए कह चुके हैं कि उनकी पारिवारिक कंपनियों की हिस्सेदारी देश के कुल एथेनॉल उत्पादन में बेहद कम है।

विशेषज्ञ क्या सुझाव दे रहे हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल नीति को और प्रभावी बनाने के लिए कुछ सुधार जरूरी हैं—

  • फ्लेक्स-फ्यूल इंजन वाले वाहनों को बढ़ावा दिया जाए।
  • उपभोक्ताओं को अलग-अलग प्रकार के ईंधन चुनने का विकल्प मिले।
  • एथेनॉल के प्रभाव से जुड़ी सभी वैज्ञानिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएं।
  • एथेनॉल मिश्रित ईंधन की कीमत सामान्य पेट्रोल से कम रखी जाए।
  • गन्ना और अनाज के बजाय पराली, बांस, धान की भूसी और कृषि अपशिष्ट से बनने वाले सेकेंड जनरेशन एथेनॉल को प्राथमिकता दी जाए।

नॉलेज कैप्सूल

  • E10 = 10% एथेनॉल + 90% पेट्रोल
  • E20 = 20% एथेनॉल + 80% पेट्रोल
  • E85 = 85% एथेनॉल + 15% पेट्रोल
  • Flex Fuel Vehicle (FFV) ऐसी गाड़ियां होती हैं जो पेट्रोल, एथेनॉल या दोनों के किसी भी मिश्रण पर चल सकती हैं।

निष्कर्ष

एथेनॉल ब्लेंडिंग भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रदूषण कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। इससे विदेशी तेल पर निर्भरता घटाने और किसानों को लाभ पहुंचाने की उम्मीद है। हालांकि वाहन तकनीक, पानी की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा, ईंधन की कीमत और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर सरकार को संतुलित नीति अपनानी होगी। आने वाले वर्षों में इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के हितों के बीच कितना संतुलन बनाया जाता है।

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