drnewsindia.com / नई दिल्ली | विशेष ब्यूरो
बड़ी खबर: केंद्र सरकार देश में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ (One Nation One Election) को अमलीजामा पहनाने के लिए एक सुरक्षित और व्यावहारिक रास्ता तलाश रही है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, समिति ‘टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल’ (Two-Phase Transition Model) पर गंभीरता से विचार कर रही है, ताकि राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में कोई बड़ी कटौती न करनी पड़े।
📅 क्या है ‘टू-फेज मॉडल’? (2029 और 2034 का प्लान)
पूरे देश को एक ही बार में साझा चुनावी चक्र में लाने के बजाय, इसे दो चरणों में लागू करना सबसे व्यावहारिक माना जा रहा है:
- पहला चरण (साल 2029): इस साल होने वाले लोकसभा चुनावों के साथ देश के करीब 20 राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं।
- दूसरा चरण (साल 2034): साल 2034 तक देश के बाकी बचे राज्यों को भी इस साझा चुनावी चक्र में शामिल कर लिया जाएगा, जिससे ‘एक देश-एक चुनाव’ का लक्ष्य पूरी तरह हासिल हो सके।

⏱️ JPC की समयसीमा और अगला कदम
- संसदीय समिति को मिला विस्तार: JPC की अवधि को 2026 के मानसून सत्र तक बढ़ाया जा चुका है।
- रिपोर्ट सौंपने की तैयारी: समिति को मानसून सत्र के आखिरी हफ्ते के पहले दिन तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट संसद को सौंपनी है। इस रिपोर्ट में सभी बैठकों, सुझावों और प्रेजेंटेशन्स के इनपुट्स शामिल होंगे, जिसके बाद संसद में चर्चा और वोटिंग होगी।
🗺️ JPC के जमीनी दौरे: उत्तराखंड और महाराष्ट्र की रिपोर्ट (मई 2025)
समिति ने पिछले साल मई 2025 में दो प्रमुख राज्यों का दौरा कर इसके प्रशासनिक और आर्थिक असर को समझा था:
🏔️ उत्तराखंड दौरा (19-21 मई 2025)
- आचार संहिता की मार: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जेपीसी को बताया कि उत्तराखंड में बार-बार चुनाव होने के कारण पिछले 3 वर्षों में करीब 175 दिन आचार संहिता लगी रही, जिससे विकास कार्य ठप रहे।
- भौगोलिक चुनौतियाँ: पहाड़ी राज्यों में चारधाम यात्रा, भारी बारिश और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बार-बार चुनाव कराना बेहद मुश्किल होता है।
- बचत का दावा: यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होते हैं, तो चुनावी खर्च में 30% से 35% तक की बड़ी बचत हो सकती है।

🏬 महाराष्ट्र दौरा (17-18 मई 2025)
- समिति ने मुख्यमंत्री, राजनीतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों, बैंकों और सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) से मुलाकात की ताकि यह जाना जा सके कि एक साथ चुनाव कराने का प्रशासन और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
⚖️ संवैधानिक विकल्प और इतिहास: क्या कहता है कानून?
कानूनी विशेषज्ञों की राय: लॉ कमीशन के पूर्व सदस्य और मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज के डीन आनंद पालीवाल के अनुसार, इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए संवैधानिक विकल्प मौजूद हैं। कुछ राज्यों का कार्यकाल पहले समाप्त किया जा सकता है, तो कुछ का बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए संसद में राजनीतिक सहमति और आवश्यक कानूनी प्रावधान जरूरी होंगे।
📜 हमारा चुनावी इतिहास: जब साथ होते थे चुनाव
- 1952 से 1967 तक: देश में शुरुआती चार बार लोकसभा और अधिकांश विधानसभा चुनाव एक साथ ही आयोजित हुए थे।
- कैसे बिखरा चक्र?: 1967 के बाद राज्यों में सरकारें गिरने लगीं। 1968-69 में कई विधानसभाएं और 1970 में लोकसभा समय से पहले भंग हो गई, जिससे यह साझा चक्र टूट गया।
📊 कोविंद पैनल की पृष्ठभूमि
इस दिशा में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 2 सितंबर 2023 को एक हाई-लेवल पैनल बनाया गया था। इस पैनल ने 191 दिनों के कड़े शोध और हितधारकों से चर्चा के बाद 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे अब आगे बढ़ाया जा रहा है।





