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एक ग्रामीण भारतीय समुदाय की यात्रा से उपजे एक इनोवेटिव आइडिया ने किशोरों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरण प्रतियोगिता का खिताब अपने नाम कर लिया है।
29 मई 2026 को, द अर्थ प्राइज (The Earth Prize) ने भारत के 16 वर्षीय विवान छाछरिया, एरियाना अग्रवाल और अव्याना मेहता को अपना ग्लोबल विनर घोषित किया। उनकी इस अनोखी खोज का नाम प्लास-स्टिक (Plas-Stick) है, जो इमली के बीजों से बना एक बायोडिग्रेडेबल चुंबकीय पाउडर है। यह पानी से माइक्रोप्लास्टिक को सुरक्षित रूप से बाहर निकाल देता है।
दुनिया भर के लगभग 23,000 लोगों के मतदान के बाद इस टीम को विजेता चुना गया। यह पहली बार है जब भारत की किसी टीम ने इस प्रतिष्ठित वैश्विक प्रतियोगिता में जीत हासिल की है।
कैसे आया यह अनोखा आइडिया?
‘प्लास-स्टिक’ को बनाने का विचार तब आया जब इस टीम ने एक ग्रामीण इलाके का दौरा किया। वहां उन्होंने देखा कि बच्चे प्लास्टिक के बड़े कंटेनरों में रखे पानी को बिना किसी आधुनिक फिल्टर के सीधे पी रहे थे।
टीम ने महसूस किया कि दुनिया भर में करोड़ों लोग ऐसे पानी पर निर्भर हैं, जिसमें प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण (माइक्रोप्लास्टिक) मिल जाते हैं। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा समाधान खोजने का फैसला किया जिसके लिए बिजली, जटिल मशीनरी या भारी-भरकम बजट की जरूरत न हो।

“छात्रों के बीच एक छोटे से विचार के रूप में शुरू हुई इस कोशिश को आज दुनिया भर के हजारों प्रोजेक्ट्स के बीच पहचान मिली है। यह हमारे लिए बेहद गर्व और प्रेरणा की बात है।” — टीम प्लास-स्टिक
कैसे काम करता है ‘प्लास-स्टिक’?
प्लास-स्टिक की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी और कृषि कचरे (वेस्ट) का उपयोग है। टीम ने फेंके गए इमली के बीजों से एक खास पाउडर तैयार किया।
इस पाउडर से पानी साफ करने की प्रक्रिया बेहद आसान है:
- पाउडर मिलाना: सबसे पहले इस बायोडिग्रेडेबल इमली के पाउडर को दूषित पानी में मिलाया जाता है।
- प्लास्टिक को बांधना: यह पाउडर एक प्राकृतिक कोगुलेंट (coagulant) के रूप में काम करता है, जो पानी में मौजूद अदृश्य माइक्रोप्लास्टिक कणों को आपस में चिपकाकर दृश्यमान गुच्छों (clumps) में बदल देता है।
- चुंबक से सफाई: इसके बाद एक साधारण हैंडहेल्ड (हाथ में पकड़े जाने वाले) चुंबक की मदद से उन गुच्छों को पानी से खींचकर बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे पानी पूरी तरह साफ हो जाता है।
इस तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए, टीम ने डॉ. राजेश खंडेलवाल के मार्गदर्शन में इसका परीक्षण और विकास किया है।
आगे की योजना क्या है?
क्षेत्रीय विजेता के रूप में पहले ही $12.5K की राशि प्राप्त करने के बाद, अब यह टीम ग्लोबल प्राइज फंड की मदद से अपने इस प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर ले जाएगी। वे अब तक वर्कशॉप के जरिए 8,000 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को इसके प्रति जागरूक कर चुके हैं।
उनका अगला लक्ष्य भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत उत्पादन केंद्र (Decentralized Production Hubs) स्थापित करना है ताकि हर जरूरतमंद तक यह तकनीक पहुंच सके।

पर्यावरण की चिंता को समाधान में बदलना
अपने 5वें वर्ष में प्रवेश कर चुका ‘द अर्थ प्राइज’, जिनेवा स्थित गैर-लाभकारी संस्था द अर्थ फाउंडेशन द्वारा संचालित किया जाता है। इसकी शुरुआत 2019 में क्लाइमेट स्ट्राइक के दौरान हुई थी, जिसका उद्देश्य युवाओं की पर्यावरण संबंधी चिंता को व्यावहारिक समाधानों में बदलना है।
द अर्थ फाउंडेशन के संस्थापक पीटर मैकगैरी ने कहा, “टीम प्लास-स्टिक ठीक उसी तरह के इनोवेशन का प्रतिनिधित्व करती है जिसे बढ़ावा देने के लिए द अर्थ प्राइज की स्थापना की गई थी। कृषि कचरे को एक व्यावहारिक उपकरण में बदलकर, इन युवा इनोवेटर्स ने एक बड़ी वैश्विक चुनौती का समाधान किया है।”
नोट: यदि आप भी 13-19 वर्ष के किसी युवा इनोवेटर को जानते हैं, तो द अर्थ प्राइज 2027 के लिए रजिस्ट्रेशन theearthprize.org पर शुरू हो चुके हैं।
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