होर्मुज तनाव के बीच खाड़ी देशों ने संभाला तेल निर्यात, ईरान का निर्यात लगभग ठप

0
3

फारस की खाड़ी में ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर जारी टकराव के बावजूद मध्य पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने अपने कच्चे तेल के निर्यात को युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंचा दिया है। शिपिंग और तेल बाजार से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र के देशों ने वैकल्पिक परिवहन व्यवस्थाओं, पाइपलाइन नेटवर्क, टैंकरों के शटल संचालन और समुद्र में जहाज बदलने जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करते हुए तेल की आपूर्ति को काफी हद तक बहाल किया है। दूसरी ओर, अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी के कारण ईरान के कच्चे तेल का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और कई सप्ताह तक होर्मुज के रास्ते से उसका कोई महत्वपूर्ण क्रूड निर्यात नहीं हो सका।

सितंबर में 16.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा निर्यात

वैश्विक ट्रेड इंटेलिजेंस कंपनी केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, 1 से 28 सितंबर 2026 के बीच मध्य पूर्व के खाड़ी क्षेत्र से ईरान को छोड़कर कम से कम 16.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल बाहर भेजा गया। यह मात्रा युद्ध से पहले के औसत स्तर के बराबर बताई गई है। मार्च में युद्ध के शुरुआती दौर के दौरान यह आंकड़ा लगभग 6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक गिर गया था। यानी सितंबर में निर्यात में करीब 10.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बड़ी रिकवरी दर्ज की गई।

इससे पता चलता है कि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के बावजूद सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, बहरीन और इराक जैसे देशों ने अपने तेल निर्यात को पूरी तरह एक ही समुद्री मार्ग पर निर्भर रखने के बजाय कई विकल्पों का इस्तेमाल किया। सितंबर के अंतिम सप्ताह में तो मध्य पूर्व से कुल कच्चे तेल का निर्यात कुछ दिनों में युद्ध-पूर्व औसत से भी ऊपर चला गया। रॉयटर्स के अनुसार 24 सितंबर और 27 से 29 सितंबर के बीच क्षेत्रीय क्रूड निर्यात 19.5 से 22.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बीच रहा।

होर्मुज से गुजरने वाले तेल का तरीका भी बदला

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। युद्ध से पहले खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले कच्चे तेल का लगभग 83 प्रतिशत हिस्सा इस जलमार्ग से गुजरता था। लेकिन सितंबर में स्थिति बदल गई। केप्लर के मुताबिक, क्षेत्र का करीब 40 प्रतिशत क्रूड अब होर्मुज को पार किए बिना वैकल्पिक रास्तों से बाहर भेजा जा रहा था, जबकि युद्ध से पहले यह हिस्सा लगभग 17 प्रतिशत था।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की पाइपलाइन व्यवस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा समुद्र में एक टैंकर से दूसरे टैंकर में तेल स्थानांतरित करने यानी ship-to-ship transfer का इस्तेमाल भी बढ़ा है। केप्लर के अनुसार अगस्त में होर्मुज से गुजरने वाले 70 प्रतिशत से अधिक क्रूड ने फुजैरा या सोहर के आसपास समुद्र में टैंकर बदले। इस व्यवस्था में बड़े क्रूड टैंकर छोटे या शटल टैंकरों के साथ मिलकर तेल की आवाजाही को जारी रखते हैं।

सऊदी अरब और यूएई ने बढ़ाई भूमिका

सितंबर में तेल निर्यात की रिकवरी में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका विशेष रूप से सामने आई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रमुख मध्य पूर्वी उत्पादकों का क्रूड निर्यात सितंबर में 16.328 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। इस दौरान सऊदी अरब और यूएई ने अपने निर्यात में बढ़ोतरी की।

सऊदी अरब के लिए वैकल्पिक निर्यात मार्ग इसलिए महत्वपूर्ण रहे क्योंकि उसके ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन नेटवर्क को भी नुकसान पहुंचा था। इसके बावजूद देश ने निर्यात व्यवस्था को फिर से व्यवस्थित किया। केप्लर के विश्लेषण में बताया गया है कि किसी एक मार्ग में बाधा आने के बाद क्षेत्रीय तेल कारोबार ने अपेक्षाकृत तेजी से दूसरे रास्तों की क्षमता का इस्तेमाल शुरू कर दिया। इससे खाड़ी देशों की लॉजिस्टिक क्षमता और वैकल्पिक बुनियादी ढांचे का महत्व सामने आया है।

कुल मिलाकर, होर्मुज संकट ने मध्य पूर्व के तेल कारोबार का नक्शा बदल दिया है। खाड़ी देशों ने वैकल्पिक पाइपलाइन, शटल टैंकर, समुद्र में जहाज बदलने और दूसरे निर्यात मार्गों का इस्तेमाल कर यह दिखाया है कि वे केवल होर्मुज पर निर्भर नहीं हैं। वहीं ईरान के लिए यही संकट अधिक गंभीर साबित हुआ है, क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी ने उसके प्रमुख तेल निर्यात मार्ग को लगभग बंद कर दिया है। ऐसे में आने वाले समय में होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, अमेरिका-ईरान बातचीत और क्षेत्रीय तेल आपूर्ति की स्थिरता वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे बने रहेंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here