जितिया व्रत 2026: नहाय-खाय से लेकर निर्जला उपवास तक तीन दिवसीय जितिया पर्व की पूरी परंपरा

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drnewsindia.com /नई दिल्ली।भारत की विविध धार्मिक और लोक परंपराओं में जितिया व्रत का विशेष स्थान है। इसे जिउतिया और जीवितपुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के कई क्षेत्रों में जितिया का विशेष महत्व है। इसके अलावा पड़ोसी देश नेपाल में भी इस पर्व को धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

आश्विन कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है जितिया

द्रिक पंचांग के अनुसार जितिया पर्व आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक तीन दिनों की परंपरा से जुड़ा हुआ है। हिंदू पंचांग के अनुसार चंद्र तिथियों के आधार पर इसकी तारीख हर वर्ष बदलती रहती है। इसलिए जितिया की तिथि तय करने के लिए संबंधित वर्ष के पंचांग और स्थानीय धार्मिक परंपराओं को देखा जाता है।

तीन दिवसीय पर्व में पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन मुख्य व्रत और तीसरे दिन व्रत पारण की परंपरा बताई जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार इन परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिल सकता है।

पहले दिन होती है नहाय-खाय की परंपरा

जितिया पर्व के पहले दिन नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान आदि के बाद भोजन ग्रहण करती हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन शरीर और मन की शुद्धता पर विशेष जोर दिया जाता है।

नहाय-खाय की परंपरा केवल भोजन से जुड़ी रस्म नहीं है, बल्कि इसे मुख्य व्रत से पहले की तैयारी के रूप में भी देखा जाता है। महिलाएं इस दिन निर्धारित पारंपरिक भोजन ग्रहण करने के बाद अगले दिन के कठिन व्रत के लिए स्वयं को तैयार करती हैं।

बिहार और झारखंड के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में नहाय-खाय के दौरान स्थानीय खान-पान और पारिवारिक परंपराओं का भी प्रभाव देखने को मिलता है। कई परिवारों में इस दिन विशेष रूप से पारंपरिक भोजन तैयार किया जाता है।

कुल मिलाकर, जितिया या जीवितपुत्रिका व्रत बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में नहाय-खाय, खुर-जितिया और व्रत पारण प्रमुख चरण हैं। संतान की सलामती और दीर्घायु की कामना इस पर्व का केंद्रीय भाव है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह पर्व मातृत्व, पारिवारिक संबंधों और क्षेत्रीय लोक संस्कृति की परंपरा को भी सामने लाता है।

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