नई दिल्ली। हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित यह महापर्व श्रद्धा, आस्था, पवित्रता और कठिन तपस्या का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2026 में भी देशभर में छठ पूजा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह रहेगा। विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के क्षेत्रों में इस पर्व को बड़े स्तर पर मनाया जाता है। हालांकि, अब छठ पूजा की परंपरा देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदायों तक भी पहुंच चुकी है।
छठ महापर्व मुख्य रूप से चार दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इसके बाद खरना, संध्या अर्घ्य और अंत में उषा अर्घ्य की परंपरा निभाई जाती है। चारों दिनों में व्रती विशेष नियमों का पालन करते हैं और सूर्य देव तथा छठी मैया की पूजा-अर्चना करते हैं। इस पर्व का समापन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद होता है।
पहला दिन: नहाय-खाय
छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती सुबह स्नान करके घर और पूजा से संबंधित स्थानों की साफ-सफाई करते हैं। इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। परंपरागत रूप से इस दिन चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी तैयार की जाती है।
भोजन बनाते समय स्वच्छता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। मान्यता है कि नहाय-खाय के साथ ही व्रती स्वयं को महापर्व के कठिन नियमों और साधना के लिए तैयार करते हैं। इस दिन से घर में छठ पूजा का धार्मिक वातावरण बनने लगता है।
छठ पूजा का दूसरा दिन खरना कहलाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं। शाम को स्नान करने के बाद विधि-विधान से पूजा की जाती है और प्रसाद तैयार किया जाता है।
खरना के प्रसाद में आमतौर पर गुड़ की खीर, रोटी और फल शामिल किए जाते हैं। पूजा के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और परिवार के अन्य सदस्यों तथा श्रद्धालुओं के बीच भी प्रसाद वितरित किया जाता है।
खरना के बाद छठ व्रत का सबसे कठिन चरण शुरू होता है। परंपरा के अनुसार, इसके बाद व्रती लगभग 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखते हैं। इस दौरान अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता है। यह उपवास उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूरा होता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन व्रती और परिवार के सदस्य पूजा की तैयारियों में जुटे रहते हैं। छठ पूजा के लिए ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल और अन्य पारंपरिक प्रसाद तैयार किए जाते हैं।
प्रसाद को बांस की टोकरी और सूप में सजाकर नदी, तालाब या अन्य जलाशयों के घाटों पर ले जाया जाता है। शाम के समय व्रती जल में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
इस दौरान सूर्य देव से परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। घाटों पर श्रद्धालुओं की मौजूदगी, छठ गीतों और पारंपरिक पूजा-विधि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
संध्या अर्घ्य छठ पर्व का एक प्रमुख आकर्षण है। इस दिन परिवार के सदस्य भी व्रती की सहायता करते हैं और पूजा की सभी आवश्यक व्यवस्थाओं में सहयोग देते हैं।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण
छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन उषा अर्घ्य के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रती सुबह सूर्योदय से पहले ही पूजा की सामग्री लेकर घाटों पर पहुंच जाते हैं।
सूर्य की पहली किरण दिखाई देने पर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस दौरान सूर्य देव और छठी मैया की आराधना की जाती है। परिवार की सुख-शांति, संतान की खुशहाली और जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने की कामना की जाती है।
उषा अर्घ्य के बाद व्रती पूजा संपन्न करते हैं और पारण के साथ अपना व्रत खोलते हैं। इसी के साथ चार दिनों तक चलने वाले छठ महापर्व का समापन हो जाता है।
बिहार और पूर्वांचल की पहचान है छठ महापर्व
छठ पूजा बिहार की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है। इसके अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में भी इसे व्यापक रूप से मनाया जाता है। रोजगार और शिक्षा के कारण दूसरे राज्यों तथा विदेशों में रहने वाले बिहार और पूर्वांचल के लोग भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं।
छठ के अवसर पर घरों में पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। बाजारों में पूजा सामग्री, फल, बांस के सूप और दउरा की खरीदारी बढ़ जाती है। घाटों की सफाई और सजावट की तैयारियां भी की जाती हैं।
इस पर्व की विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक सहयोग और सामूहिक भागीदारी को भी काफी महत्व दिया जाता है। परिवार के सदस्य, पड़ोसी और स्थानीय समुदाय मिलकर पूजा की तैयारियों में योगदान देते हैं।
व्रत के दौरान स्वच्छता और सावधानी जरूरी
छठ पूजा के दौरान व्रती कठिन नियमों का पालन करते हैं। ऐसे में अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। निर्जला उपवास सभी के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होता। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और किसी बीमारी से पीड़ित लोगों को व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
इसके साथ ही पूजा के दौरान घाटों पर स्वच्छता बनाए रखना, जलाशयों में सावधानी बरतना और प्रशासन की ओर से जारी सुरक्षा निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
छठ महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, अनुशासन, परिवार के प्रति समर्पण और सामाजिक एकता का संदेश भी देता है। नहाय-खाय से शुरू होकर उषा अर्घ्य और पारण तक चलने वाली चार दिनों की यह परंपरा करोड़ों श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ती है। यही वजह है कि छठ पूजा को भारतीय संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट लोक आस्था के पर्वों में गिना जाता है।





