नई दिल्ली। भारत में दिवाली का त्योहार केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और खुशियां मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुख-समृद्धि, खुशहाली, पारिवारिक एकता और नई शुरुआत का भी प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। दिवाली का उत्सव सामान्यतः पांच दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और समापन भाई दूज के साथ होता है। इन पांचों दिनों में अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा, धार्मिक परंपराओं और खरीदारी से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं।

दिवाली के अवसर पर लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, रंग-रोगन करवाते हैं और घरों को दीपक, फूलों तथा रंग-बिरंगी रोशनी से सजाते हैं। इसके साथ ही बाजारों में भी खरीदारी की रौनक देखने को मिलती है। कोई सोना-चांदी खरीदता है तो कोई बर्तन, झाड़ू, कपड़े, मिठाइयां और पूजा सामग्री घर लाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दिवाली के पांच दिनों में कुछ विशेष वस्तुओं की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं धनतेरस से भाई दूज तक प्रत्येक दिन का महत्व और इस दौरान कौन-सी चीजें खरीदने की परंपरा है।
1. धनतेरस: सोना-चांदी और बर्तन खरीदना माना जाता है शुभ
दिवाली उत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। इसे धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है।
धनतेरस पर मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन शुभ वस्तुओं की खरीदारी करने से घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य बना रहता है।
धनतेरस पर क्या खरीदना चाहिए?
- सोना और चांदी: इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के और अन्य वस्तुएं खरीदने की परंपरा है।
- बर्तन: पीतल, तांबे और स्टील के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।
- झाड़ू: धार्मिक मान्यताओं में झाड़ू को मां लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। इसे घर लाना शुभ माना जाता है।
- पूजा सामग्री: दीपक, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और पूजा के लिए आवश्यक सामग्री भी खरीदी जाती है।
- धनिया: कुछ क्षेत्रों में साबुत धनिया खरीदने की परंपरा भी प्रचलित है।
2. नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली: दीपक और सजावट का महत्व
धनतेरस के अगले दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है, जिसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है। यह कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक अत्याचारी का वध करके लोगों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी।
इसलिए यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। कई क्षेत्रों में इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और घर के बाहर दीपक जलाने की परंपरा है।
3. दिवाली: मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का दिन
पांच दिवसीय दीपोत्सव का सबसे प्रमुख दिन दिवाली होता है। यह कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी धन और समृद्धि की देवी हैं, जबकि भगवान गणेश को बुद्धि, शुभता और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है।
दिवाली के दिन घरों में विशेष सजावट की जाती है। शाम को शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश पूजन किया जाता है और घर के अलग-अलग हिस्सों में दीपक जलाए जाते हैं।
4. गोवर्धन पूजा: अन्नकूट और प्रकृति के प्रति आभार
दिवाली के अगले दिन कई क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इसे अन्नकूट पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन पर्वत से जुड़ी कथा पर आधारित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और प्रकृति के महत्व को समझाया था। कथा के अनुसार, जब इंद्र ने भारी वर्षा की तो भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की।
इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है और उसकी पूजा की जाती है। कई स्थानों पर अन्नकूट का आयोजन होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के पकवान और खाद्य पदार्थ भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
5. भाई दूज: भाई-बहन के प्रेम और रिश्ते का त्योहार
पांच दिवसीय दिवाली उत्सव का अंतिम दिन भाई दूज होता है। इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है।
इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और उनकी लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की कामना करती हैं। भाई भी अपनी बहनों को उपहार देते हैं और उनके प्रति स्नेह व्यक्त करते हैं।
भाई दूज से जुड़ी पौराणिक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। यमुना ने उनका स्वागत किया और आतिथ्य सत्कार किया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। यमुना ने इच्छा जताई कि इस दिन हर भाई अपनी बहन के घर जाए और उससे स्नेहपूर्वक मिले। यमराज ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली।




