लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा चुनाव ने राजनीतिक दलों के सामने संख्या बल की नई चुनौती खड़ी कर दी है। राज्य की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर 2026 को मतदान होना है। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक इसी दिन मतगणना भी होगी। 10 सीटों में से मौजूदा संख्या के आधार पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों की स्थिति मजबूत है, जबकि समाजवादी पार्टी दो सीटों के लिए जरूरी संख्या जुटाने की स्थिति में है। असली गणित तीसरी सीट और दूसरी तरफ भाजपा के संभावित आठवें उम्मीदवार को लेकर बन रहा है।
111 वोट का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण?
सपा के पास विधानसभा में फिलहाल 101 विधायक बताए जा रहे हैं। कांग्रेस के दो विधायक उसके साथ माने जाएं तो सपा-कांग्रेस का आंकड़ा 103 तक पहुंचता है। 103 वोट दो राज्यसभा सीटों के लिए जरूरी 74 वोट से अधिक हैं। इस स्थिति में दो सीटों के लिए संख्या बल पर्याप्त है, लेकिन तीसरी सीट के लिए 111 वोट चाहिए होंगे।
यही वह जगह है जहां 111 का आंकड़ा सपा के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। सपा-कांग्रेस के 103 विधायकों के आधार पर देखें तो तीसरी सीट के लिए उसे आठ अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे। दूसरी ओर कुछ रिपोर्टों में सपा के संभावित समर्थन के व्यापक दायरे में कुछ ऐसे विधायक भी शामिल किए जा रहे हैं, जिनकी राजनीतिक स्थिति या गठबंधन संबंध अलग-अलग हैं। इसलिए वास्तविक रणनीति केवल घोषित गठबंधन के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहने वाली है।
सपा ने दो उम्मीदवार उतारे, तीसरे पर नजर
समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाया है। दोनों ने 30 सितंबर को नामांकन दाखिल किया। नथवानी का नाम सपा की सूची में आने के बाद राज्यसभा चुनाव का राजनीतिक गणित और चर्चा में आ गया है।
मौजूदा संख्या बल के हिसाब से इन दो उम्मीदवारों के लिए जरूरी वोट जुटाना सपा के लिए अपेक्षाकृत आसान गणित है। तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने पर तस्वीर बदल जाती है, क्योंकि तब 111 प्रथम वरीयता वोट की जरूरत होगी।
सपा की ओर से तीसरा उम्मीदवार उतारने की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चा इसलिए भी है क्योंकि तीसरे उम्मीदवार के मैदान में आने पर चुनाव सीधे अतिरिक्त वोटों और संभावित क्रॉस-वोटिंग के गणित पर आ सकता है। हालांकि अंतिम तस्वीर नामांकन वापस लेने की समयसीमा के बाद ही स्पष्ट होगी।
सपा के लिए 111 का आंकड़ा केवल गणित नहीं, बल्कि अतिरिक्त राजनीतिक समर्थन जुटाने की चुनौती भी है। उसके अपने 101 विधायक और कांग्रेस के दो विधायक मिलकर 103 होते हैं। ऐसे में तीसरी सीट के लिए आठ अतिरिक्त प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत पड़ती है। दूसरी ओर, एनडीए के पास सात सीटों के लिए पर्याप्त संख्या होने के बाद आठवीं सीट के लिए भी अतिरिक्त समर्थन जुटाने का सवाल है।




