छत्तीसगढ़ में पहली बार फैला दुर्लभ संक्रमण: सरगुजा के ट्राइबल बेल्ट में लेप्टोस्पाइरा व स्क्रब टाइफस के 72 केस; पहाड़ी कोरवा और पंडो जनजाति के लोग शिकार

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अंबिकापुर/सरगुजा | डिजिटल डेस्क: नॉर्थ छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। सरगुजा के आदिवासी (ट्राइबल) इलाकों में जानवरों के पेशाब और माइट (कीट) से फैलने वाले दुर्लभ संक्रमण—लेप्टोस्पाइरा (Leptospira) और स्क्रब टाइफस (Scrub Typhus)—के कुल 72 पॉजिटिव मरीज मिले हैं।

संक्रमितों में विशेष रूप से पहाड़ी कोरवा और पंडो जनजाति के लोग शामिल हैं, जिनकी उम्र 9 वर्ष से 65 वर्ष के बीच है। हालांकि, राहत की बात यह है कि समय पर इलाज मिलने से सभी मरीज अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं।

🦠 छत्तीसगढ़ में पहली बार दिखा यह इन्फेक्शन

अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष (HOD) डॉ. पंकज टेभूलकर ने बताया कि यह बीमारी छत्तीसगढ़ में पहली बार देखी गई है:

  • अंतरराष्ट्रीय संदर्भ: सामान्यतः यह संक्रमण दक्षिण अमेरिकी देशों (जैसे ब्राजील, पेरू) और अफ्रीकी महाद्वीप के देशों में ज्यादा पाया जाता है।
  • भारत में फैलाव: भारत में इससे पहले इसके मामले मुख्य रूप से दक्षिण भारत के मदुरै (तमिलनाडु) में सामने आए हैं।
  • चिंता का विषय: मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्र में अचानक इन दो बीमारियों का मिलना डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए गहन शोध का विषय बन गया है।

📊 संक्रमण के कुल आंकड़े (सरगुजा बेल्ट)

बीमारी / इन्फेक्शनकुल पॉजिटिव केसमुख्य कारण / वाहक
लेप्टोस्पाइरा (Leptospira)50दूषित पानी/मिट्टी और जानवरों के पेशाब के संपर्क में आने से।
स्क्रब टाइफस (Scrub Typhus)22घास/झाड़ियों में पाए जाने वाले छोटे ‘माइट’ (कीट) के काटने से।
कुल मरीज72पहाड़ी कोरवा एवं पंडो जनजाति के नागरिक

🩺 लक्षण, जांच और बचाव का तरीका

  1. 5 दिन से ज्यादा बुखार: यदि किसी मरीज को लगातार 5 दिनों से अधिक समय तक बुखार रहता है, तो उसका एलाइजा (ELISA) ब्लड टेस्ट कराया जाता है।
  2. मानसून में खतरा: मानसून की शुरुआत और बारिश के दिनों में यह इन्फेक्शन काफी तेजी से फैलता है।
  3. लापरवाही पड़ सकती है भारी: यदि समय पर सही इलाज न मिले, तो लेप्टोस्पाइरा और स्क्रब टाइफस से मरीज के किडनी और लिवर डैमेज (खराब) हो सकते हैं, जिससे जान भी जा सकती है।

🔬 मेडिकल कॉलेज की टीम गांव-गांव जाकर करेगी रिसर्च

मामले की गंभीरता को देखते हुए अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन, कम्युनिटी मेडिसिन और माइक्रोबायोलॉजी विभाग की संयुक्त टीम इस पर विस्तृत रिसर्च कर रही है:

ग्राउंड रिसर्च: मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों की टीम प्रभावित आदिवासी गांवों का दौरा करेगी। वहां संदिग्ध मरीजों की जांच के साथ-साथ मिट्टी, पानी व अन्य आवश्यक सैंपल एकत्रित किए जाएंगे ताकि संक्रमण के वास्तविक सोर्स का पता लगाया जा सके।

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