नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) और विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर भ्रम पैदा करने की कोशिश बताया है। इसी क्रम में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं पर तीखा हमला बोला है।
राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं पर नड्डा का निशाना
नड्डा ने अपने बयान में केवल राहुल गांधी को ही निशाने पर नहीं लिया, बल्कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी नाम लिया। उन्होंने इन नेताओं पर संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
भाजपा नेता ने विपक्षी नेताओं के लिए ‘टूलकिट मानसिकता’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। नड्डा के मुताबिक, विपक्ष लगातार ऐसे मुद्दे उठाकर राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष की राजनीति का उद्देश्य देश की प्रगति में बाधा डालना और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर करना है। हालांकि, ये नड्डा और भाजपा की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें विपक्ष स्वीकार नहीं करता।
SIR विवाद बना राजनीतिक बहस का केंद्र
SIR यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण इस समय राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। चुनाव आयोग की ओर से SIR प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों और कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दलों ने कई सवाल उठाए हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि SIR से संबंधित निर्णयों में औपचारिक असहमति दर्ज नहीं हुई और संबंधित आदेशों पर आयोग के सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।
इसी विवाद के बीच कुछ रिपोर्टों में चुनाव आयुक्तों के बीच विभिन्न मुद्दों पर टिप्पणियों और आपत्तियों का उल्लेख किया गया। विपक्ष ने इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। आयोग के पक्ष से हालांकि यह स्पष्ट किया गया कि किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान चुनाव आयुक्त सवाल या टिप्पणी कर सकते हैं, लेकिन इसे औपचारिक असहमति यानी ‘डिसेंट’ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इस अंतर को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।




