भारत में सोना सिर्फ आभूषण या निवेश का साधन नहीं, बल्कि परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक बचत का अहम हिस्सा माना जाता है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक सोने की खरीदारी को शुभ माना जाता है। लेकिन लगातार बढ़ती कीमतों ने अब इस परंपरागत बाजार की रफ्तार धीमी कर दी है। सोने के दाम ऊंचे होने के कारण आम परिवार खरीदारी में कटौती कर रहे हैं। इसका असर देश की कुल सोने की मांग पर भी दिखाई देने लगा है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की 3 नवंबर 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पूरे साल 2026 के दौरान सोने की मांग लगभग 650 मीट्रिक टन रह सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह वर्ष 2020 के बाद भारत में सोने की सबसे कम सालाना मांग होगी। कोरोना महामारी के दौरान वर्ष 2020 में बाजार और आभूषण कारोबार प्रभावित होने के कारण सोने की मांग में बड़ी गिरावट आई थी। अब छह साल बाद एक बार फिर मांग के उस स्तर तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
सितंबर तिमाही में 29 फीसदी की गिरावट
सोने की खरीदारी में आई सुस्ती जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही के आंकड़ों में भी स्पष्ट दिखाई देती है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, इस अवधि में भारत की कुल सोने की मांग सालाना आधार पर 29 फीसदी घटकर 162.5 मीट्रिक टन रह गई। पिछले साल इसी तिमाही में यह मांग 229.8 मीट्रिक टन थी। यानी एक साल के भीतर बाजार में खरीदारी की मात्रा में उल्लेखनीय कमी आई है।
इस गिरावट में आभूषण और निवेश, दोनों क्षेत्रों की भूमिका रही। सितंबर तिमाही में आभूषणों की मांग 20 फीसदी घटकर 99.9 टन रह गई, जबकि सोने के बार और सिक्कों जैसी निवेश श्रेणी की मांग में सालाना आधार पर 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि महंगे सोने का असर केवल शादी-ब्याह और त्योहारों के लिए गहने खरीदने वाले ग्राहकों पर ही नहीं, बल्कि सोने में निवेश करने वालों पर भी पड़ा है। World Gold Council+1
कीमतें बढ़ीं, लेकिन खरीदारी की मात्रा घटी
सोने की मांग में गिरावट की सबसे बड़ी वजह इसकी ऊंची कीमतें मानी जा रही हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर तिमाही में भारत में सोने की औसत कीमत लगभग 1,48,891 रुपये प्रति 10 ग्राम रही। पिछले साल की इसी अवधि में यह औसतन 1,02,287 रुपये प्रति 10 ग्राम थी। इस तरह एक साल में औसत कीमत में करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
महंगे सोने का सीधा असर ग्राहकों की खरीदारी क्षमता पर पड़ा है। जो परिवार पहले किसी शादी या त्योहार के लिए तय बजट में गहने खरीद लेते थे, अब उन्हें उसी बजट में कम वजन के आभूषण खरीदने पड़ रहे हैं। कुछ ग्राहक खरीदारी टाल रहे हैं, जबकि कई लोग भारी गहनों के बजाय हल्के डिजाइन या सीमित मात्रा में सोना खरीदने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर भी सामने आया है। सोने की मांग की मात्रा कम हुई है, लेकिन कुल खर्च का मूल्य बढ़ा है। सितंबर तिमाही में मांग की मात्रा 29 फीसदी घटने के बावजूद सोने पर किया गया कुल खर्च पिछले साल की तुलना में लगभग 3 फीसदी बढ़कर 2.419 लाख करोड़ रुपये रहा। इसका अर्थ है कि ग्राहकों ने कम मात्रा में सोना खरीदा, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण कुल भुगतान अधिक करना पड़ा।
त्योहार और शादी का सीजन दे सकता है सहारा
भारत में अक्टूबर से दिसंबर तक का समय सोने के कारोबार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। दशहरा, दिवाली और शादी-विवाह के मौसम में आभूषणों की खरीदारी बढ़ने की परंपरा है। कई परिवार इन अवसरों पर सोना खरीदना शुभ मानते हैं। इसी वजह से वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल को दिसंबर तिमाही में मांग में कुछ सुधार की उम्मीद है।
हालांकि, त्योहारों के कारण खरीदारी बढ़ने की संभावना के बावजूद ऊंची कीमतें बड़ी चुनौती बनी रह सकती हैं। ग्रामीण इलाकों में कमजोर आय और शहरी परिवारों के बढ़ते घरेलू खर्च भी बाजार की गति सीमित कर सकते हैं। इसलिए त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि पूरे साल की गिरावट की भरपाई आसानी से हो जाएगी।
मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि भारत में सोने के प्रति लोगों की दिलचस्पी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, बल्कि कीमतों के अनुसार खरीदारी का तरीका बदल रहा है। ग्राहक अब बजट और जरूरत को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं। कम वजन के आभूषण, सीमित खरीदारी और निवेश के अलग-अलग विकल्पों पर विचार करने की प्रवृत्ति बाजार में दिखाई दे रही है।
कुल मिलाकर, वर्ष 2026 भारतीय सोना बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। ऊंची कीमतें, बढ़ती जीवन-यापन लागत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मौसम का दबाव मांग को प्रभावित कर रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का लगभग 650 मीट्रिक टन का अनुमान इसी बदलती स्थिति की ओर संकेत करता है। आने वाले महीनों में दिवाली और शादी के सीजन से बाजार को कितना सहारा मिलता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सोने की कीमतों में तेजी के बावजूद खरीदारी की मात्रा में आई कमी ने भारतीय बाजार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।





