drnewsindia.com/ भोपाल
मशहूर और बेमिसाल शायर डॉ. बशीर बद्र का रुखसत होना सिर्फ भोपाल ही नहीं, बल्कि पूरी उर्दू दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। भोपाल के जाने-माने लेखक और साहित्यकार कौसर सिद्दीकी ने उनके निधन पर गहरा दुख जताते हुए पुरानी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि बशीर साहब का जाना उर्दू अदब (साहित्य) के एक सुनहरे दौर का अंत है।
📸 पहली मुलाकात: जब मंच पर मिली ‘दाद’
कौसर सिद्दीकी ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उनका पहला बड़ा मुशायरा बशीर बद्र साहब के साथ ही हुआ था।
- साल और जगह: 1968, शाहजहांपुर (ऑल इंडिया मुशायरा)
- वो यादगार पल: “उस मुशायरे में मुझे भी कलाम पढ़ने का मौका मिला था। उसी मंच पर बशीर बद्र साहब भी मौजूद थे। जब उन्होंने मेरे शेर सुने, तो बड़े दिल से मुझे दाद (सराहना) दी। एक नवागंतुक शायर के लिए इतने बड़े उस्ताद शायर से सराहना मिलना किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था। वही दाद मेरे साहित्यिक सफर की एक शानदार शुरुआत बन गई।”
🤝 भोपाल का दौर और ‘अपनत्व’
शाहजहांपुर के बाद कौसर सिद्दीकी की मुलाकातें भोपाल में भी लगातार जारी रहीं। खासकर उस दौर में जब डॉ. बशीर बद्र मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के चेयरमैन हुआ करते थे।

“वे जब भी मिलते, बेहद मोहब्बत और अपनत्व के साथ पेश आते थे। उन्होंने मुझे अपने हाथों से ‘अहमद शाह सैयद ऑल इंडिया अवॉर्ड’ से नवाजा था, जो आज भी मेरे जीवन का एक गौरवशाली अध्याय है।” — कौसर सिद्दीकी
💔 जब कमजोर हो गई थी याददाश्त…
बशीर साहब के आखिरी दिनों का जिक्र करते हुए कौसर सिद्दीकी भावुक हो गए। उन्होंने बताया:
- “जब बशीर साहब की याददाश्त कमजोर हो गई थी, तब मैं उनसे मिलने उनके घर गया था।”
- “अस्वस्थता के कारण उन्होंने मुझे पहचाना तो नहीं, लेकिन अपने चिर-परिचित शायराना और तहजीबदार अंदाज में मुझे सलाम जरूर किया।”
- “वह पल बेहद भावुक करने वाला था। चेहरे पर वही पुराना नूर और लहजे में वही शराफत थी।”
🥀 उर्दू अदब को कभी न भरने वाली क्षति
कौसर सिद्दीकी ने कहा कि बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को आम आदमी के दिल की आवाज बनाया। उनके लिखे शेर हमेशा लोगों की जुबान पर रहेंगे, लेकिन उनका शारीरिक रूप से चले जाना पूरी दुनिया के साहित्य प्रेमियों के लिए एक ऐसा खालीपन है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।





